अकेलापन
सुना है मैंने किसी और से कि एक इंसान को अकेला रहना पसंद है, उसे भीड़ बिल्कुल पसंद नहीं। जब मुझे यह पता चला तो मैंने इस पर गहराई से विचार करना शुरू किया और इस शब्द का विश्लेषण किया।
जब एक इंसान अपनी माँ के गर्भ से जन्म लेता है, तब उसे कुछ मालूम नहीं होता। न किसी से रिश्ता-नाता, न कोई दोस्त-साथी और न ही उसे बाहरी दुनिया से कोई मतलब रहता है। फिर वही बच्चा जब बड़ा होता है, पढ़ना-लिखना सीखता है, तो जो शब्द वह पहले नहीं जानता था, अब उन्हें जानने लगता है।
और जब वह पढ़-लिख जाता है, तो उसका संबंध दोस्त-साथी, रिश्ते-नाते… जैसी तमाम चीज़ों से हो जाता है। ये सब उसके पास उपलब्ध हो जाती हैं। वह इंसान खेलता-कूदता है, नाचता-गाता है और खूब मस्ती करता है।
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लेकिन अचानक ऐसा क्या होता है कि यही इंसान आगे चलकर अकेला रहना पसंद करने लगता है?
होता कुछ नहीं है, बल्कि जब एक इंसान अपनी उम्र से पहले अपने दुख, तकलीफ, गरीबी, बेरोजगारी, महामारी और भ्रष्टाचार जैसी तमाम कड़वी सच्चाइयों को देखता है, तो वह समाज की इस हालत को देखकर अंदर से निराश हो जाता है। वह परिस्थितियों के आगे खुद को बेबस महसूस करने लगता है; क्योंकि वह पहले कई प्रयास करके हार चुका होता है। ऐसे में वह अपनी ख्वाहिशों को समय पर छोड़ देता है, लेकिन मेहनत करना नहीं छोड़ता। वह संघर्ष करता रहता है, हार कभी नहीं मानता!
अकेलेपन का दर्द है गहरा,
पर मन को सुकून है देता,
भीड़ में खोए हम,
खुद को पाने का यही है रास्ता।



